>1. जो मित्र न हो, मित्र होने पर भी ज्ञानी न हो, ज्ञानी होने पर जिसका अपने मन पर नियंत्रण न हो उसे अपना गुप्त मंत्र नहीं बताना चाहिये। किसी की परीक्षा किये बिना अपना सहयोगी नहीं बनाना चाहिये।
2.जो मोहवश बुरे कर्म करता है, उन कार्यों का विपरीत परिणाम होने से अपने जीवन को ही नष्ट कर देता है।
3.जिसके क्रोध और हर्ष व्यर्थ नहीं जाते और आवश्यक कार्य करते हुए स्वयं ही सतर्कता बरतता है और अपने आर्थिक स्थिति का पूरा ज्ञान जिसे है उसको पृथ्वी पर्याप्त संपदा प्रदान करती है।
4.जो संधि विग्रह आद छः गुणों का ज्ञान होने के लिये प्रसिद्ध है तथा अपनी स्थिति, विकास और पतन का समझता है और जिसके स्वभाव से सभी लोग प्रभावित होते हैं पृथ्वी उसकी रक्षा करती है।
5. उत्तम कर्मो का अनुष्ठान तो सुख देने वाला होता है, किंतु उन्हीं का अनुष्ठान न किया जाये तो पश्चाताप भी होता है।

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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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