>जेहि रहीम तन मन लियो, कियों हिए बिच भीन
तासों दुख सुख कहन की, रही बात अब कौन

कवि रहीम का कथन है कि जिस व्यक्ति ने तन मन पर अधिकार कर लिया है, उसने हृदय में स्थान बना लिया है, ऐसे प्रेमी से दुख, सुख कहने की अब कौन सी बात शेष रह गयी।

निज कर क्रिया रहीम कहीं, सुधि भावी के हाथ
पाँसे अपने हाथ में, दांव न अपने हाथ

कवि रहीम कहते हैं कि अपने हाथ में तो कर्म करना है परिणाम भविष्य के गर्भ में है जैसे जुआरी के हाथ में खेल के पाँसे कौडी तो अपने हाथ में होते हैं, परन्तु दाव अपने वश में नहीं होता।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यह सच भी है कि जिससे हम हृदय से प्रेम करते हैं उससे सुख दुःख की क्या कहना? वह तो स्वयं ही सब पढ़ सकता है। फिर उसके पास होने से सुख दुःख का विचार ही कहां आता है। जिससे प्रेम है वह पास होता है तो सुख की अनुभूति होती है उसका वर्णन उसके सामने करने से क्या लाभ? जब वह दूर होता है तो दुःख की अनुभूति होती है पर अगर हम उस तक अपनी यह भावना पहुंचायेंगे तो वह वह दुःखी होगा। समय के अनुसार मिलना बिछड़ना तो होता ही है।

जीवन में कर्म करना अपने हाथ में है पर परिणाम के लिये कुछ कहना कठिन है। हम कोई कार्य शुरू करते हैं तो उससे अनेक तरह के फल की आशायें करते हैं पर वह प्राप्त न होने पर निराशा घेर लेती है। सच तो यह है परमात्मा ने कर्म करने के लिये हाथ दिये हैं पर उनसे अपना भाग्य नहीं लिखा जाता। वह तो सब समयानुसार प्राप्त होता है। इसलिये अपने हाथों से हमेशा ही अच्छे कर्म करने के लिये तत्पर रहना चाहिये और परिणाम की आशा परमात्मा की इच्छा पर ही छोड़ देना चाहिये।

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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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