>जहां तीन लाख के आसपास व्यूज मेरे सभी ब्लाग पर हों वहां दस हजार की संख्या कोई मायने नहीं रखती पर ब्लागस्पाट पर आधिकारिक रूप से यह संख्या पार करने वाला यह पहला ब्लाग है। अध्यात्मिक ब्लाग पर यह सफलता कोई अधिक नहीं है पर अगर वह ब्लागस्पाट का हो तो उसका महत्व इसलिये दिखता है क्योंकि वर्डप्रेस के मुकाबले यहां कम ही व्यूज आते हैं। वैसे इसका सहधर्मी ब्लाग शब्दलेख सारथी भी दस हजार के पार पहुंच चुका होगा स्टेटकांउटर उस पर बहुत विलंब से लगाया था इसलिये आधिकारिक रूप से वह इससे अभी कुछ पीछे है। वैसे मेरे ब्लाग स्पाट के ब्लाग भी यह संख्या पार कर चुकें होंगे पर आधिकारिक रूप से उसका कोई लेखा नहीं है।
इस ब्लाग पर कांउटर पहले दिन से ही लगा है इसलिये इसकी संख्या को लेकर कोई संदेह नहीं है। मजे की बात यह है कि मेरे मित्र ब्लाग लेखकों को यही ब्लाग पसंद है और यह संख्या पार होने में उनका ही योगदान अधिक है। प्रसंगवश अनेक मित्रों ने अन्य ब्लाग के मुकाबले इसे ही अधिक लिंक किया है।
जहां तक अध्यात्म विषयों पर लिखने का सवाल है तो मैं नहीं जानता इन पर क्यों लिखता हूं? एक आदत बन गयी है। मेरे पास जो किताबें हैं सुबह उठकर उनका अध्ययन करते हुए ही इन पर लिखता हूं। इस ब्लाग और शब्दलेख सारथी पर नये पाठ लिखता हूं बाकी अन्य अध्यात्म ब्लाग पर यहीं से पाठ कापी कर रखता हूं। आखिर इतने सारे ब्लाग क्यों?
यह सवाल कई मित्र मुझसे पूछते हैं? दरअसल मैंने कुछ ब्लाग सर्च इंजिनों के रुख को देखने के लिये बनाये हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि मैं स्वयं भ्रमित हो रहा हूं पर फिर यह भी देखता हूं कि यहां कोई पूरी तरह अपने आपको सर्वज्ञानी नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि अंतर्जाल पर कुछ नया सीखने और उसके प्रयोग करने की गुंजायश है और इसी कारण कुछ ब्लाग लेखक अधिक
संख्या में ब्लाग बनाते हैं और यकीनन वह कुछ इससे सीख रहे हैं।

शब्दलेख सारथी मैंने पहले छद्म नाम से बनाया था पर फिर एक मित्र के आग्रह पर उस पर अपना नाम लिखा। इन दोनों ब्लाग पर लिखते समय मेरे मन में कोई भाव नहीं होता। न तो टिप्पणियों की चिंता होती है न पाठकों की। इस भौतिक युग में सुख सुविधाओं से ऊबे लोगों के मन में अध्यात्म के प्रति रुझान अधिक बढ़ रहा है यह अलग बात है कि उनकी भावनाओं का शोषण कर उसे अपने आर्थिक लाभ में परिवर्तन करने वालों की सख्या भी बढ़ रही है। भारतीय अध्यात्म के मूल तत्वों की पूरी जानकारी होने का दावा तो कोई खैर क्या करेगा पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि उसमें ही हृदय को प्रफुल्लित करने वाले तत्व मौजूद हैं पर उसके लिये ज्ञान का होना जरूरी है। दरअसल अध्यात्मिक ब्लाग शुरु करने का उद्देश्य श्रीगीता पर लिखना था पर उस समय हिंदी टूल लिखने वाले टूल संस्कृत के श्लोक लिखने के लिये ठीक नहीं लगे। तब अन्य महापुरुषों की रचनाओं से काम चलाया तो यह एक आदत बन गयी। भर्तृहरि,चाणक्य,कबीरदास,रहीम,मनुस्मृति,विदुर तथा अन्य अध्यात्मिक मनीषियों के संदेशों में आज भी भारत के लोगों की अथाह रुचि है यह बात अंतर्जाल पर ही आकर पता लगी।
इस ब्लाग के दस हजार पूरे होने पर कुछ लिखने का कुछ मतलब नहीं है पर यहां यह बताना जरूरी है कि हमारा देश विश्व में अध्यात्म गुरु इसलिये माना जाता है क्योंकि हमारे प्राचीन मनीषियों ने अपनी तपस्या से जो ज्ञान अर्जित किया वह सत्य के निकट था। उनके पास कोई लेबोरेटरी या दूरबीन नहीं थी जिसका प्रयोग कर वह सृष्टि के सत्यों के निकट पहुंचते बल्कि उन्होंने अपनी अंतदृष्टि को ही इतना सिद्ध बना दिया कि जो विश्लेषण उन्होंने बहुत पहले प्रस्तुत किये पश्चिम की दुनियां अब उस पर पहुंच रही है।
पहले तो मैं केवल महापुरुषों के संदेश ही लिखता था पर कृतिदेव का टूल मिलने के बाद इन पर व्याख्यान भी लिखने लगा। अनेक ब्लाग लेखक मित्र इसके लिये आग्रह करते थे पर इंडिक टूल से ऐसा करना संभव नहीं लगता था। अब जैसी बनती है लिखता हूं। कोई व्यवसायिक अध्यात्मिक गुरु तो हूं नहीं कि उन पर बहुत आकर्षक लिख सकूं। जैसा विचार मन में आता है लिखता हूं। सच बात तो यह है कि यह लिखना अपने अध्ययन के लिये होता है न कि अपना ज्ञान बघारने के लिये। इस अवसर पर अपने ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को धन्यवाद।
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