>किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम्।
दुष्टकुलीनोऽपि विद्वांश्च देवैरपि सुपूज्यते।।

हिंदी में भावार्थ- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि प्रतिष्ठित कुल में जन्म लेने के बावजूद ज्ञान और विद्या से रहित होने वाले व्यक्ति से समाज को कोई लाभ नहीं होता। उससे तो निम्म कोटि में उत्पन्न व्यक्ति धन्य है जो विद्वता अजिर्त कर समाज में सम्मान पाते हैं।
विद्वान् प्रशस्यते लोक विद्वान् गच्छति गौरवम्।
विद्ययां लभते सर्व विद्या सर्वत्र पूज्यते।।

हिंदी में भावार्थ-सारे संसार में विद्वान ही प्रशंसा के योग्य होते हैं और उनका अपनी विद्या े कारण गौरव प्राप्त होता है। विद्या का यह गुण है कि उससे प्राप्त करने वाले व्यक्ति का सभी जगह सम्मान हेाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-चाहे कोई व्यक्ति कितने भी धनी,प्रतिष्ठत और उच्च कुल में पैदा क्यों न हुआ अगर उसके पास विद्या और ज्ञान नहीं है तो उसका समाज में कोई हृदय से सम्मान नहीं करता। यह अलग बात है कि धनी, बाहूबली और उच्च परिवार का होने के कारण किसी व्यक्ति के समक्ष कोई उसका दोष नहीं कहता और दिखाने के लिये सामने सभी वाह वाह करते हैं पर हृदय से उसका सम्मान नहीं होता। यह सही है कि धन जीवन की जरूरत है पर मान सम्मान से जीन में भी मनुष्य की शान होती है। समाज तभी किसी व्यक्ति का सम्मान करता है जब वह अपने कर्म से जनहित मेें काम करता है। जिसके पास विद्या है वही इस सत्य को जानते हैं इसलिये समाज को भी यही शिक्षा देते हैं। विद्या के बिना मनुष्य पशु की तरह बनकर रह जाता है। चाहे व्यक्ति गरीब हो या अमीर, राजा हो या रंक, और स्त्री हो या पुरुष विद्यावान व्यक्ति का ही सम्मान करते हैं क्योंकि उससे उनको आपातकाल में बौद्धिक सहायता मिलती है।
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