>उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाऽमभासाम् ।।

हिंदी में भावार्थ-अपने द्वारा अर्जित धन का त्याग करना ही उसकी रक्षा करने का प्रयास है। जिस तरह तालाब में अधिक भरे जल को निकालने से उसकी रक्षा होती है वैसे ही अपने धन की रक्षा भी तभी संभव है जब उसमें से कुछ निकाल दिया जाये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति के लोभ की कोई सीमा नहीं है और यही कारण है कि वह केवल धन संग्रह में लगा रहता है। हर आदमी यही सोचता है कि उसका धन केवल उसे ही दिख रहा है बाकी लोग तो उसे जानते नहीं है इसलिये वह सुरक्षित है। यह केवल एक वहम है। दरअसल धन का कोई महत्व हो या नहीं पर इतना तो जरूर है कि वह आत्मविश्वास का एक बहुत बड़ा स्त्रोत है। इसलिये जिस आदमी के पास धन आता है उसका अहंकार भी बढ़ता जाता है। कहीं न कहीं आदमी अपने मुख से ही अपने धन की महिमा का बखान करने ही लगता है। इस तरह अन्य लोगों को वैसे भी धन होने का आभास हो जाता है। यह संभव नहीं है कि आदमी के पास बहुत सारा धन हो और यह बात किसी अन्य को पता नहीं चले। ऐसे में अल्प धन वाले लोगों की नजरें उस पर लगी रहती हैं। ऐसे में अपने धन की रक्षा का एक ही उपाय है कि उसे निकाला जाये। निकालने से यह आशय यह नहीं कि उसका अपव्यय किया जाये बल्कि गरीब और मजबूरों की सहायता करने के उद्देश्य से दान किया जाना चाहिये।
यह दान करते हुए अपने मन में कोई अहंकार नहीं पालने की बजाय यह सोचना चाहिये कि हम तो अपने धन के तालाब की रक्षा कर रहे हैं। जिस तरह तालाब में पानी भर जाने पर उसे निकाला न जाये तो वह किनारों को क्षतिग्रस्त और गंदा करते हुए बाहर स्वतः बहने लगता है वैसे ही धन भी पानी की तरह है। अगर अधिक धन का परित्याग नहीं करेंगे तो वह बुरी नजर वालों को आपके घर में आने का आमंत्रण देगा या फिर ऐसी परेशानियां देगा जिसमें आपका धन अनावश्यक व्यय होगा।
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