>यही बड़ाई शब्द की, जैसे चुंबक भाय।
बिना शब्द नहिं ऊबरै, केता करै उपाय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि उसी शब्द की प्रशंसा होती है जो चुंबक की तरह दूसरे के हृदय को प्रभावित करता है। जब तक शब्द ज्ञान नहीं होगा तब तक कितना भी प्रयास किया जाये आदमी इस संसार रूपी भव सांगर से उबर नहीं सकता।
सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय।
बिना समझै शब्द गहै, कछु न लोहा लेय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब अच्छी तरह सीखकर सोचते और विचारते हुए शब्द बोला जाता है वही सुख देता है। जब तक शब्द का अर्थ और भाव समझ में नहंी आयेगा तब तक कोई लाभ नहीं होने वाला।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अनेक लोगों ने शिक्षा के क्षेत्र में ढेर सारी उपाधिययों प्राप्त की ली हैं। इतना ही नहीं उन्होंने धर्मग्रंथों से भी अनेक प्रकार के दोहे और श्लोक रट लिये हैं उसका अर्थ भी बढ़िया ढंग से प्रस्तुत करते हैं पर वह उसे धारण नहीं कर पाते। तोते की तरह रटने वाले ऐसे लोगों ने समाज के कल्याण का ठेका भी ले लिया है। समस्या यह है कि शब्द ज्ञान सुनने या पढ़ने के बाद उस पर चिंतन और मनन आवश्यक है वरना वह व्यवहार में नहीं आ पाता। आप देखियें प्रेम, अहिंसा और मधुर वाणी का उपयोग करने के संदेश देने वाले कितने ज्ञानी इस देश में है पर वह उनका व्यवसाय है और कभी वह उस ज्ञान को धारण कर पायें हों -जो उन्होंने पढ़ा है-ऐसा नहीं लगता।
लोग भी उनको सुनते हैं फिर भूल जाते हैं। उनके शब्दों में चुंबक जैसी शक्ति नहीं है जिससे लोग प्रभावित हो सकें। जो व्यक्ति ज्ञान के शब्द पढ़कर उसे धारण करता है उसी की वाणी में ओज आ सकता है वरना नहीं।
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