>‘तीरथ व्रत अरु दान करु महि धरहि गुमान।
नानक निहफल जात तिह जिउ कुंचर इस्नान।’
हिंदी में भावार्थ-
गुरु ग्रंथ साहब के अनुसार तीर्थ, व्रत और दान अगर मन में भी अहंकार आया तो वह निष्फल हो जाता है जिस प्रकार हाथी नहाने के बाद शरीर पर धूल डालकर स्वयं गंदा कर देता है।
‘गुरु जिना का अंधुला सिख भी अंधे करम करेनि।’
हिंदी में भावार्थ-
गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी के अनुसार जिनके गुरु अज्ञानी होंगे उनके शिष्य भी वैसे ही अंधकर्म उनसे सीखेंगे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्री गुरुनानक देव जी ने जीवन भर भारतीय धर्म में व्याप्त अंधविश्वास तथा कुरीतियों का विरोध किया। भारतीय धर्म में दान, व्रत और तीर्थ की बहुत महिमा है। अपनी नियमित दिनचर्या से हटकर कुछ अन्य करने से व्यक्ति का मानसिक संताप कम होता है और इसलिये दान, व्रत और तीर्थ जैसे तरीके बनाये गये। लोग यह सब इस विचार से नहीं करते कि इससे उनकी देह और मन में शुद्धता आयेगी बल्कि वह यह सोचते हैं कि हमने अगर तीर्थ किया तो ईश्वर, दान किया तो ग्रहणकर्ता और व्रत किया तो अन्न पदार्थों पर अहसान किया। यह अहंकार करने से हमारी सारी अध्यात्मिक और धार्मिक गतिविधियां निष्फल हो जाती हैं। इसका कारण यह है कि इस देह से चाहे कोई भी अच्छा काम किया जाये पर उसके लिये हमारे मन में भी शुद्धता का भाव होना चाहिये तभी किसी भी अच्छे काम का परिणाम पूर्ण रूप से ग्रहण कर सकते हैं। जहां मन में अहंकार आया वहीं सब किया धरा रह जाता है। देह के साथ मन में भी पवित्रता को होना बहुत आवश्यक है।
कोई व्यक्ति कैसा है यह उसके गुरु को देखकर पता किया जा सकता है। उसी तरह कौन गुरु कैसा है उसके शिष्यों के व्यवहार से पता लगता है। श्रीगुरुनानक साहब जी धर्म के नाम पर पाखंड के बहुत विरोधी थे। अपने समकालीनों में वह इसी कारण लोकप्रिय भी हुए क्योकि समाज कथित ढोंगियों से तंग हो गया था। देखा जाये तो स्थितियां आज पहले से बदतर हैं। धार्मिक गुरु संख्या में बहुत हैं पर फिर देश में अधर्म का बोलबाला है। इससे यह तो जाहिर होता है कि देश में धर्म के नाम पर उपदेश वाले संतों की वाणी भले ही ओजपूर्ण हो पर प्रभावी नहीं है। एक कान में शोर के साथ घुसती है तो दूसरे से शांतिपूर्वक निकल जाती है। अतः हमेशा ही न स्वयं अच्छे और निष्कामी संतों की शरण लेकर उनको गुरु बनाना चाहिये बल्कि अपने बच्चों का भी इस संबंध में मार्ग दर्शन करना चाहिये।
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