>प्रभूतं कार्यमल्पं या यन्नरः कर्तुमिच्छति।
सवरिमभेण तत्कार्य सिंहादेके प्रचक्षते।।
हिंदी में भावार्थ-
कार्य छोटा हो या बड़ा उससे पूरी शक्ति के साथ करने का गुण सिंह से सीखना चाहिये।
इंद्रियाणि च संयभ्य बकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वां सर्वकार्याणि साधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
ज्ञानी लोगों को चाहिये कि अपनी इंद्रियों को वश में कर देशकाल के अनुसार अपनी शक्ति को पहचाते हुए कोई भी कार्य एकाग्रता से करने का गुण बगुले से सीखे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आज के प्रतियोगी युग में जहां आदमी को अधिक सतर्कता, एकाग्रता तथा अपनी पूरी शक्ति से काम करने की आवश्यकता होती है वहां लोग लापरवाही तथा और बिना सोचे समझे कार्य करने के आदी होते जा रहे हैं। जीवन की सफलता का कोई संक्षिप्त मार्ग नहीं है। दूसरों के कहने में आकर बिना जांचे परखे काम प्रारंभ करने का अर्थ है कि अपने लिये नाकामी और तनाव मोल लेना। इतना ही नहीं दूसरों की सफलता को देखकर उन जैसा ही जल्दी बनने की इच्छा अनेक लोगों को कर्जे और अपराध के दलदल में डाल देती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि लोगों ने परिश्रम के काम को छोटा काम मान लिया है। हर कोई चाहता है कि वह आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित कार्यालयों में काम करे जहां वह समाज में दूसरे लोगों को सभ्य लगे। परिश्रम के प्रति यह अरुचि समाज में वैमनस्य का भी कारण बन रही है। परिश्रमी व्यक्ति को असम्मानित दृष्टि से देखना उसके अंदर कुंठा को जन्म देती है जो अंततः कहीं घृणा तो कहीं अपराध के रूप में परिवर्तित हो जाती है। इसके अलावा जिन लोगों को परिश्रम से परहेज है वह जिंदगी में अधिक तरक्की भी नहीं कर पाते-केवल ख्वाब देखते हुए तनाव में जीते हैं। काम करने का गुण तो शेर से सीखना चाहिये जो अपने लिये भोजन स्वयं जुटाने के लिये परिश्रम करता है। एकाग्रता बगुले से सीखना चाहिये। जो काम करना है उसी में भविष्य की सफलता मानकर एकाग्रता से उसमें लगना चाहिये।
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