>यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं उण्डयेघ्वतन्द्रितः।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलन्बलवत्तराः।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि अपराध कर्म करने वालो को सजा देने में राज्य अगर सावधानी से काम नहीं लेता तो शक्ति शाली व्यक्ति कमजोर को उसी तरह नष्ट कर देता है जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है।
अद्यत्काकः पुरोडाशं श्वा च लिह्याद्धविस्तथा।
स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चितप्रवतेंताधरोत्तरम्।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर राज्य अपनी प्रजा को बचाने के लिये अपराधियों को दंड नहीं देता तो कौआ पुरोडाश खाने लगेगा, श्वान हवि खा जायेगा और कोई किसी को स्वामी नहीं मानेगा अंततः समाज पहले उत्तम से मध्यम और फिर अधम स्थिति को प्राप्त होगा।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी देश में राज्य दंड का प्रभावी होना आवश्यक है। वहां की न्यायायिक व्यवस्था का मजबूत होना ही जनता की शांति और सुख की गारंटी होती है। अगर वर्तमान संदर्भ में अपने देश की स्थिति देखें तो ऐसा लगता है कि हमारे देश में कानून व्यवस्था की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। मजे की बात यह है कि अपराधियों और धनियों के इशारे पर चलने वाले लोग मनुस्मृति के विरुद्ध प्रचार अभियान छेड़े रहते हैं शायद इसका कारण यह है कि इसमें अपराधों कें लिये कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। हालांकि इसमें कुछ जातीय पूर्वाग्रह हैं पर जातिगत व्यवस्था जन्म पर आधारित हो इसका समर्थन नहीं किया गया। फिर सभी जातियों को अपने स्वाभाविक कर्म में लिप्त होने का आग्रह इसमें किया गया है पर इसका आशय यह नहीं कि कोई उसमें बदलाव नहीं किया जा सकता।
इस आधार पर ही मनुस्मृति का विरोध नहीं किया जाता कि उसमेें छोटी जातियों और महिलाओं आज के संदर्भ में प्रासंगिक बातें लिखी हुई है। हो सकता है कि मनुजी के काल में उन बातों को लिखने वाले प्रसंग रहे हों और अब उनका कोई महत्व नहीं हो। दूसरा यह भी है कि अनेक विद्वान कहते हैं कि मनुस्मृति में अनेक अंश उनके बाद जोड़े गये हैं।
इस आधार पर यह तो कहा जा सकता है कि मनुस्मृति के कुछ अंश वर्तमान संदर्भ में महत्व न हों पर उसे पूरी तरह नकारना एक तरह से समाज को चेतनाविहीन बनाये रखने की एक योजना लगती है। इसमें कई ऐसे संदेश हैं जो व्यक्तिगत जीवन में भी बहुत महत्व रखते हैं।
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