>‘जे सउ चंदा उगवहि सूरज चढ़हि हजार।
ऐते चानण होदिआँ गुर बिन घोर अँधार।।
हिंदी में भावार्थ-
श्री गुरु ग्रंथ साहिब वाणी के अनुसार अगर सैंकड़ों चंद्रमा और हजारों सूरज मिलकर भी उग जायें पर बिना गुरु के जीवन में अंधकार ही रहेगा। इतना प्रकाश कोई अन्य नहीं कर सकता जितना गुरू अपने ज्ञान के द्वारा कर देता है।
‘भाई रे गुर बिनु गिआनु न होइ।
पूछहु ब्रह्मै नारदै बेद बिआसै कोइ’।।
हिंदी में भावार्थ-
श्री गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी के अनुसार गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता इस बात की पुष्टि ब्रह्मा, नारद और वेदव्यास भी करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-किताबें चाहे कितनी भी पढ़ लें पर जब तक गुरु से उसके पढ़ने और समझने का तरीका नहीं समझा तब तक ज्ञान को धारण करना कठिन है। हमारे भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान में गुरू का अधिक महत्व प्रतिपादित किया गया है। यह अलग बात है कि सामान्य जनमानस मेें जो गुरू के प्रति भाव है उसे देखते हुए हर कोई गुरू बनना चाहता है। हमारा भारतीय अध्यात्मिक दर्शन यह भी कहता है कि सच्चे गुरू से ही ज्ञान प्राप्त करना चाहिए वरना तो भ्रष्ट गुरु पूरे जीवन को भी नष्ट कर देते हैं। प्रचार माध्यमों में जो गुरु छाये हुए हैं उनमें गुरु की तलाश करने पर अनेक लोग निराशा अनुभव करते हैं। गुरू का फिल्मी अभिनेताओं की तरह प्रसिद्ध होना आवश्यक नहीं है। हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग हैं जो ज्ञान रखते हैं उनको ही हृदय में गुरु की तरह धारण कर उनसे ज्ञान चर्चा करें तो भी ठीक है। जिनके ढेर सारे शिष्य हैं उनके प्रवचनों में जाकर बैठने या दीक्षा लेने से हमारी गुरु की आवश्यकता पूरी नहीं होगी। यह जरूरी नहीं है कि गुरु कोई सन्यासी या व्यवसायिक प्रवचनकर्ता हो। आजकल व्यवसायिक सन्यासियों और व्यवसायिक कथावाचकों को भी गुरू बनने का शौक चर्राया है। गुरु कोई भी हो सकता है। कोई सद्गृहस्थ भी ज्ञानी हो सकता है। उनसे ज्ञान प्राप्त करते रहें। अध्यात्मिक शक्ति के बिना भौतिक संसार को समझा नहीं जा सकता। यह शक्ति केवल गुरु के प्रकाश में ही पाई जा सकती है।
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