>हीरा न तहां न खोलिए, जहं खोटी है हाट।
कसि करि बांधो गांठरी, उठि करि चालो बाट।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने हीरे को उस बाजार में मत खोलिए जहां खोटी नीयत वाले उपस्थित हैं। उसे तो अपनी गांठ में कसकर अपनी राह चल दीजिए।
हीरा परखै जौहरी, शब्दहि परखै साध।
कबीर परखै साधु को, ताका मता अगाध।।
हीरे की परख जौहरी और सत्य शब्द का मतलब सज्जन व्यक्ति ही समझ सकता है। उसी तरह जो सत्य और ज्ञान के शब्दों को परख लेता है उसकी चिंतन क्षमता अगाध हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-विश्व में बाजार की शक्ति निरंतर बढ़ती जा रही है। आधुनिक समय के संचार माध्यमों में विचारों की अभिव्यक्ति के नाम पर ऐसे संदेश लोगों को सुनाये जा रहे हैं जो उनके अंदर काम, लोभ और अहंकार की प्रवृत्तियों को अनियंत्रित होने के लिऐ प्रेरित करते हैं। ऐसे में हालत तो यह है कि भली बात कहना भी अपने आपको परेशानी में डालना है। किसी भी वस्तु का विज्ञापन कर उसे विक्रय के लिये प्रस्तुत किया जाता है पर सत्य अध्यात्मिक ज्ञान के लिये कोई प्रचार नहीं होता। हालांकि हमारे भारत के प्राचीन ग्रंथों में अनेक कथायें हैं और उनको सुनाकर अनेक व्यवसायिक संत खूब धन बटोर रहे हैं। उनको ऐसा करते हुए कुछ लोग भारतीय धर्म के विरुद्ध दुष्प्रचार भी करते हैं पर यह उनका भ्रम है। भारत का अध्यात्मिक ज्ञान अंतकरण में प्रकाश फैलाता है। जब आदमी के अंतकरण में प्रकाश होता है तो वह स्वतः बाहर फैलता है। उसके आचरण, व्यवहार और विचार से उसका आभास हो जाता है उसके लिये विज्ञापन की आवश्यकता नहीं होती।
सच बात तो यह है कि ज्ञानचर्चा बाजार में नहीं की जा सकती। वहां अनेक लोग बहस करते हैं। अनेक लोगों का तो काम ही यही है कि बहस कर अपने को विद्वान साबित करो। उससे भी बात न बने तो अभद्र शब्द उपयोग में लाकर दूसरे को अपमानित कर स्वयं को सम्मानित करो। इसलिये अच्छा यही है कि समान विचार वालों के साथ अपने विचार बांटे। जहां कुविचारी लोगों का जमावड़ा देखें वहां से पलायन कर जायें।
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