>लुब्धमथेंन गृह्णीयात् स्तब्धमंजलिकर्मणा।
मूर्ख छन्दोऽनृवृत्तेन यथार्थत्वेन पण्डितम्।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि लोभी मनुष्य को धन देकर, हठी को हाथ जोड़कर, मूर्ख की इच्छा पूरी कर तथा बुद्धिमान को सही स्थिति बताकर अपने वश में किया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्रोध या निराशा से जीवन में सफलता नहीं मिल सकती न ही केवल किसी की चाटुकारिता से कुछ मिलता है। जीवन में हमेशा रणनीति से काम करना चाहिये। वैसे तो अपने आसपास हमें लोभियों का समुदाय दिख ही रहा है। जिसे देखो वही अपने लिये धन जुटाना चाहता है। लोग इतना धन जुटा रहे हैं कि उनका पूरे जीवन में स्वयं उपयोग नहीं कर सकते पर फिर भी उनका मन नहीं भरता। अतः अपना काम करने पर किसी को पैसा देकर उसे करवाया जा सकता है। लोभ ने ही लोगों को मूर्ख बना रखा है अतः उनकी इच्छा पूर्ति कर ही उनसे काम निकाला जा सकता है। इसमें एक दूसरी समस्या है कि धन आने से लोगों में हठ आ जाता है। अपने समान वह किसी को कुछ नहीं समझते। अतः ऐसे लोगों से वाद विवाद करना भी ठीक है। वह कहते हैं कि ‘हम बड़े हैं’ तो उनसे बहस करने की बजाय हाथ जोड़कर उनकी बात स्वीकार कर लें। लोभियों मूर्खों तथा हठियों से बचना कठिन है क्योंकि उनका अस्तित्व सभी जगह है। ऐसे में अपने संपर्क बुद्धिमानों से अपने संबंध बनायें। अपने बुद्धिमान मित्रों को अपनी स्थिति से अवगत कराकर उनसे सलाह आदि लेना चाहिये। उनसे झूठ या मक्कारी करने अपने आपको धोखा देना है। इस तरह अगर जीवन में रणनीति से काम किया जाये तो क्रोध और निराशा से बचा जा सकता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anantraj.blogspot.com
————————

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन