>रथः शरीरं पुरुषस्य राजन्नात्मा नियंन्तेनिद्रयाण्यस्य चाश्वाः।
तैरप्रमतः कुशली सवश्वैर्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर जी के अनुसार मनुष्य की देह रथ की तरह और बुद्धि उसकी सारथी है। इंद्रियां घोड़े की तरह उसमें जुती हुई हैं। इन घोड़ों को अपनी बुद्धि के कौशल से जो बस में करता है वही अपनी इस देह रूप रथ से जीवन की यात्रा सुख से तय करता है।
अनर्थमर्थतः पश्यन्नर्थ चैवाप्यनर्थतः।
इन्द्रियैरजितैबांलः सुदुःखं मन्यते सुखम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
इंद्रियां वश में न होने पर अज्ञानी मनुष्य अर्थ को अनर्थ तथा अनर्थ को अर्थ समझकर भारी कष्ट को भी सुख मान बैठता है।
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-जब हम अपने कर्तापन के अहंकार को त्यागकर अपने जीवन को दृष्टा की तरह देखेंगे तभी यह समझ पायेंगे कि हमारी देह का संचालन मन, बुद्धि और अहंकार किस तरह करते हैं। इंद्रियां स्वयमेव संचालित है पर उनका मार्गदर्शन बुद्धि के द्वारा ही होता है। यही बुद्धि उनको ऐसे कामों में लगाती है जिनका परिणाम दिखने में तात्कालिक रूप से लाभकर लगता है पर कहीं न कहीं उसका प्रभाव बुरा पड़ता है। आजकल मनोरंजन के नाम पर चहुं और असत्य और कल्पना को परोसा जा रहा है जिसे देखकर लोग भावनाओं के उतार चढ़ाव के साथ चलते हैं जो उनके मस्तिष्क को भारी कष्ट पहुंचाने वाली प्रक्रिया है। अमेरिका के एक विशेषज्ञ ने बताया है कि जो निरंतर रंगीन टीवी देखते हैं एक समय उनके नेत्रों की रंगों की पहचान करने की क्षमता क्षीण होती है। इससे यह समझा जा सकता है कि रंगीन टीवी पर रंगीन दृश्य देखकर सुखद अनुभूति होती है पर कालांतर में उसका परिणाम कितना बुरा होता है।
यही स्थिति आजकल के संगीत के बारे में भी कही जाती है। तेज आवाज लगातार सुनने से कानों की श्रवण शक्ति पर बुरा प्रभाव पड़ता है पर टीवी चैनल हों या रेडियो कानफाड़ूं संगीत चलाकर लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं। सुनने वालों को शायद यह अच्छा भी लगता है पर शरीर पर होने वाले दुष्प्रभावों को कोई नहीं समझता। मन है तो मनोरंजन होगा पर उसके लिये अपने शरीर को हानि पहुंचे वह काम नहीं करना चाहिये। इसके लिये यह जरूरी है कि लोग अपनी बुद्धि का सदुपयोग करें। यही बुद्धि है जो कुशल सारथी हो सकती है बशर्ते हमारा संकल्प ऐसा हो।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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