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निरर्थ कलह प्राज्ञो वर्जयन्मूढसेवितम्।
कीर्ति च लभते लोके न चानर्थेन युज्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
बिना बात के कलह करना मूर्खो का कार्य है। बुद्धिमान पुरुषो को चाहिए कि वह इस बुराई से दूर रहें। बिना बात के विवाद करने से एक तो यश नहीं मिलता दूसरा अनेक बार बेकार के संकटों का सामना करना पड़ता है।
न च रात्रौ सुखं शेते ससर्प इव वेश्मनि।
यः कोपयति निर्दोषं सदोषोऽभ्यन्तरं जनम्।
हिन्दी में भावार्थ-
जो स्वयं दोषी होकर भी निर्दोष और आत्मीय व्यक्ति को कुपित करता है वह सांप के निवास करने वाले घर वाले मनुष्य की भांति सुख से सो नहीं सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पूरा जीवन शांति तथा सुख से बिताने की अगर आवश्यकता अनुभव करें तो बस एक ही उपाय है कि दूसरों के दोष देखना बंद कर दें और निरर्थक विषयों पर बहस से बचें। इससे परंनिंदा जैसे आत्मघाती दोष तथा हिंसा से बचाव किया जा सकता है। अगर इस धरती पर होने वाले झगड़ों को देखें तो शायद ही उनका कोई कारण होता हो। अगर राजकाज से जुड़ा आदमी है तो वह सामान्य प्रजाजनों के लिये प्रभाव जमाने के लिये अन्य राज्यों से निरर्थक विवाद करता है या फिर राज्य के अंदर ही पहले असामाजिक तत्वों के खिलाफ पहले ढीला ढाला रवैया अपना कर उनको प्रोत्साहन देता है और फिर बाद में विलंब से कार्यवाही कर वाह वाही लूटता है। यही हालत सामान्य आदमी की भी है वह अपने से जुड़े लोगों में प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिये निरर्थक डींगें हांकता है-अवसर मिले तो किसी कमजोर पर प्रहार का अपनी शक्ति दिखाता है।
इस प्रकार मानवीय प्रवत्तियों में अहंकार सारे झगड़ों की जड़ है। इस प्रयास में लोग निर्दोष तथा मासूम लोगों पर आक्रमक करते हैं या उनको सताते हैं जो कि अंततः उनके लिये दुःखदायी होता है। याद रखें कि निर्दोष या आत्मीयजन को सताने के बाद कोई सुख से वैसे ही नहीं रह सकता जैसे कि सांप को घर में देखने के बाद कोई आदमी चैन से नहीं रह पाता।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anantraj.blogspot.com
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