>पंचेन्द्रियश्च मत्र्यश्च छिद्र चेदेकामिनिद्रयम्।
लतोऽस्य स्त्रवति प्रज्ञा दृतैः पात्रादिवोदकम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
पांच ज्ञानेन्द्रियों वाले मनुष्य में यदि एक इंद्रिय में भी छिद्र या दोष उत्पन्न हो जाये तो उसकी बुद्धि इस प्रकार बाहर निकल जाती है, जैसे मशक के छेद से पानी।
षड् दोषाः पुरुषेणेह हात्व्या, भूतिमिच्छता।
निन्द्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिन मनुष्यों को जीवन में विकास करना है उनके नींद, तन्द्रा (बैठे बैठे सोना या ऊंधना), डर, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता (थोड़ समय में होने वाले काम पर अधिक देर लगाना) जैसे छह गुणों से परे होना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह देह है तो सभी कुछ है। अपने पारिवारिक, सामाजिक तथा आर्थिक दायित्वों का निर्वहन करने के लिये उसका हमेशा स्वस्थ रहना जरूरी है। यदि कहीं उसमें दोष उत्पन्न हुआ तो फिर न तो मनुष्य अपने दायित्व निर्वाह कर पाता है और न ही लोग उसे सम्मान देते हैं। उल्टे वह अपने परिवार पर बोझ बन जाता है। अक्सर हम लोग कहते हैं कि हमें समय नहीं मिल पाता कुछ सोचने या करने के लिये! इसलिये व्यायाम या योग साधना नहीं कर पाते। मगर यह केवल मोह में लिप्पता का भाव है जो मनुष्य को व्यायाम से परे रखता है। जब यही देह बिगड़ती है तब चिकित्सकों के पास जाने का समय तो निकालना ही पड़ता है। जब वह आराम करने को कहता है तब घर भी बैठना पड़ता है। इससे वही लोग परेशान भी होते हैं जिनके लिये हम सदैव कुशलता चाहते हैं।
आज पूरे विश्व में भारतीय योग साधना का प्रभाव इसलिये बढ़ रहा है क्योंकि शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक शुद्धता में उससे जो सहायता मिलती है वह आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रमाणित है। सामान्य व्यायाम से अधिक कहीं अधिक योगसाधना स्थाई और लाभप्रद है। इससे अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रहता है। दरअसल इ्रद्रियों का हम उपयोग खूब करते हैं पर उनकी शुद्धता का विचार नहीं करते। जब उनमें किसी एक में दोष पैदा होता है तो हमारी बुद्धि और मन उसी में केद्रित हो जाता है और फिर दूसरा काम तब तक नहीं कर सकते जब तक उस दोष से मुक्त न हो जायें।
कहने का तात्पर्य यही है कि योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान से अपने को स्वस्थ रखने का प्रयास करना चाहिये तभी जीवन का आंनद पूरी तरह से ले सकते हैं। एक बार अगर देह में मौजूद कोई एक भी इंद्रिया दोषयुक्त हुई तो फिर जीवन में नकारात्मक प्रभाव दिखाने लगती है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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