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कारणाकरणाक्रुद्धान्बुध्येत स्वपरिग्रहे।
पापानकारणक्रुद्धां द्धांतस्तूष्र्णी दण्डेन साधयेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
जो दुष्ट लोग अपने परिवार के कारण या अकारण क्रोध के वशीभूत होकर शत्रु बनते हैं उनसे निपटने के लिये उपाय चुपचाप करें।
ये तु कारणतः क्रुद्धास्तान्वान्वशी कृत्य संवेसेत्।
शमयेद्दानमानाभ्या छिद्रंच परिपूरयेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
अन्य कोई सज्जन मनुष्य अपने ही किसी कारण से क्रोधित हो गये हों उन्हें अपने वश में करने का उपाय कर उनके शत्रु भाव का दमन करें। दान और मान देकर उनका क्रोध शांत करें अपने लिये उत्पन्न विरोध रूपी छिद्र को बंद करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यवहार कुशल मनुष्य कभी भी शत्रु बनाने में दिलचस्पी नहीं रखते। वह ऐसे कारणों से परे रहते हैं जिससे अन्य मनुष्य उनके शत्रु बनें। वह प्रशंसनीय है पर इस धरती पर सभी कुछ मनुष्यों की इच्छा से नहीं चलता। यहां ऐसे मूर्ख भी है जो अकारण बैर लेते हैं। राह चलते हुए बुद्धिमान आदमी को हिंसा से परे रहने वाला जानकर उस पर शाब्दिक हमला कर अपनी श्रेष्ठता और शक्ति का प्रदर्शन करने उनका आनंद आता है। उनकी यह बदतमीजी असहनीय होती है। ऐसे अकारण बने शत्रु या विरोधी चाहते हैं कि बुद्धिमान आदमी उतावली में अपना धीरज खोकर अपनी बेवकूफी का परिचय दे। उनके जाल में नहीं फंसने वाला ही वास्तव में बुद्धिमान है। ऐसे अकारण उत्पन्न हुए शत्रु या विरोधी से निपटने की चुपके से योजना बनाते हुए समय आने पर अपना असली रूप अवश्य दिखाना चाहिये। ऐसे मूर्ख लोग कभी न कभी विपत्ति में फंसते हैं तब उनसे बदला अवश्य लेना चाहिये ताकि समय ठीक होने पर वह पुनः आक्रमण का विचार भी न करे।
उसी तरह अगर किसी बुद्धिमान सज्जन पुरुष को हमसे नाराजी हो तो उसे प्रसन्न करना चाहिये भले ही उसे कुछ धन या सम्मान देना पड़े। कहा जाता है कि बुद्धिमान की बाहें लंबी होती हैं और समय आने पर जब वह बदला लेता है तो हाथों के तोते उड़ जाते हैं।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
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