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सोने रूप धाह दइ, उत्तम हमारी जात।
वन ही में की घूंघची, तोली हमरे साथ।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सोने  की परख के लिये उसे आग में जलाया जाता है पर फिर भी  अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करते हुए सोना मानो शिकायत करता है कि कहां मेरी तुलना वन में पैदा हुई घुंघची से की?
तोल बराबर घूंघची, मोल बराबर नांहि।
मेरा तेरा पटतरा, दीजै आगी मांहि।।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि तोल में घूंघची सोने की बराबरी कर सकती है पर मोल में नहीं।  इनकी असलियत का पता तब चलता है जब आग में जलने पर सोने की श्रेष्ठता प्रमाणित हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आदमी का बाह्य रूप चाहे कितना भी आकर्षक हो पर उसमें बुद्धि और विवेक की शुद्धता नहीं है तो वह किसी काम का नहीं है।  सोना का मूल गुण चमक है और वह उसे अग्नि में जलकर भी बचाये रहता है उसी तरह मनुष्य का मुख्य गुण परोपकार और भक्ति करना है।  कोई मनुष्य चाहे कितने भी अच्छे कपड़े पहनता हो, धनवान हो, उच्च पदारूढ़ हो या बाहूबली, अगर वह समाज के काम का नहीं है तो उससे कुछ सीखने का प्रयास नहीं करना चाहिये क्योंकि अपने लिये उपभोग की सामग्री तो पशु भी जुटा लेते हैं अगर किसी मनुष्य ने दूसरों की अपेक्षा अधिक  समृद्धि जुटा ली तो कौनसा तीर मार लिया?
दूसरी बात हम  यह भी देखें कि हमारी दैनिक समस्याओं के हल में ऐसे लोग ही मदद करते हैं जिनको हम तुच्छ या गरीब कहते हैं। अनेक पूंजीपति  अपने यहां काम करने वाले श्रमिकों या कर्मचारियों को छोटा जरूर समझते हैं पर दैहिक या मानसिक संकट आने पर वही लोग उनके सबसे पहले सहायक बनते हैं।  हमारे देश में लोगों की प्रवृत्ति है कि वह धनवान, उच्च पदारूढ़ तथा बाहूबली लोगों की चाटुकारिता इस आशा से करते हैं कि पता नहीं उनमें कब काम फंस जाये, पर जब विपत्ति काल आता है तो उनको छोटे लोगों से ही सहायता मिलती है।
कहने का अभिप्राय यह है कि हम अपने बाह्य रूप में निखार करने की बजाय अपने अंदर आंतरिक गुणों का विकास करें ताकि समाज में हमारी उत्कृष्ट छबि  का निर्माण हो सके।  इसके अलावा बाह्य रूप देखकर किसी के बारे में अच्छी राय कायम नहीं करना चाहिये जब तक उसके आंतरिक गुणों की पहचान न हो जाये।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
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