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चित्रगुप्त सभ लिखते लेखा।
भगत जना कउ दृस्टि न पेखा।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य के सारे कर्मों का लेख चित्रगुप्त रखते हैं पर जो भगवान भक्ति में लीन रहते हैं।
देइ किवाड़ अनिक पड़दे महि, परदारा संग फाकै।
चित्रगुप्तु जब लेखा मागहि, तब कउशु पड़दा तेरा ढाकै।।
हिन्दी में भावार्थ-
चाहे हम दरवाजा बंद करके या परदा कर बुरे कर्म करें पर उसका हिसाब चित्रगुप्त महाराज रखते हैं। मनुष्य अपने कर्मों से मरने पर भी पीछा नहीं छुड़ा सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के मन में कुछ होता है और वह बोलता कोई दूसरी बात है। देखता कुछ है बताता दूसरे ढंग से है। पाखंड और ढोंग का जीवन जीने की मानव की सहज प्रवृत्ति है। वह दरअसल अपने आप से भागता है पर छिप नहीं पाता। झूठ बोलते हुए मनुष्य यह सोचता है कि उसे कोई नहीं देख रहा है पर वह स्वयं को तो देखता है। इस धरा पर जीवन चलाने वाले उस परमात्मा को किसने देखा है? वह सभी को देखता है। इसलिये अपने कर्म करते समय यह विचार अवश्य करना चाहिये कि उनका लेखा कोई रख रहा है।
झूठ, बेईमानी, भ्रष्टाचार और ठगी का कर्म करने वाले यह सोचते हैं कि उनको कोई नहीं देख रहा है तो उनका वहम है। हर आदमी अपने आपको देख रहा है यानि उसके अंदर परमात्मा का अंश आत्मा भी उसका आभास देता है कि वह कौनसा काम कर रहा है। बुरे काम करने वाले को पता होता है कि वह गलती कर रहा है पर खालीपीली अपने आपको दिलासा देता है कि कोई नहीं देख रहा है।
इस संसार में जहां अच्छे काम का परिणाम मिलता है तो बुरे काम की सजा भी सामने आती है। इतना ही नहीं मनुष्य का कर्म उसके मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ते। इसलिये अपने अंदर हमेशा ही सात्विक कार्य करने का विचार करना चाहिए।

संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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