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नाणुरतच्छ्रुतेरिति चेन्नेतराधिकारात्।
हिन्दी में भावार्थ-
यदि हम कहें कि जीवात्मा अणु नहीं है क्योंकि श्रुतियों में उसे महान और व्यापक बताया गया है तो ठीक नहीं लगता क्योंकि संभवतः वहां आशय परमपिता परमात्मा से है।
अविरोधष्चन्नवत्।
हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकार एक क्षेत्र या देश में लगाया हुआ चंदन अपने गंध रूपी गुण को सब ओर फैलाता है वैसे ही आत्मा पूरे शरीर का संचालन करता है तो इसमें विरोध नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आत्मा अजन्मा और अमर है। वह अणु रूप है या नहीं कहना कठिन है। श्रुतियों में उसे महान बताया गया है पर संभवतः उनका आशय परमात्मा से है। आत्मा की तुलना तो चंदन से की जा सकती है। जिस तरह चंदन का वृक्ष अपने सुगंध से पूरे क्षेत्र में फैलाता है वैसे ही आत्मा पूरे शरीर में स्थित रहकर उसका संचालन करता है। इसका आशय यह है कि वह अणु रूप है। श्रीगीता में भी वर्णित है कि जब आत्मा जब अपनी देह से अलग होता है तो वह उस देह से इंद्रियों के गुण भी ले जाता है। वैसे पश्चिम वैज्ञानिकों का यह दावा है कि आत्मा का वजन 21 ग्राम है। उनका आशय यह है कि जब आदमी जीवित रहता है और जब मरता है तब उसके वजन में 21 ग्राम की कमी आती है। कहना कठिन है कि सच क्या है, पर इतना तय है कि उसका अस्तित्व हमारी देह में रहता है। अगर हम उसकी अनदेखी कर अच्छे कर्म नहीं करते तो हमारी इंद्रियां दुर्गुणों का संग्रह करती हैं। वहीं अगर हम अच्छे काम करें तो सद्गुणों का संचय होता है जिनको अंततः आत्मा ग्रहण करता है। शायद इसलिये कहते हैं कि जिसका लोक सुधरता है वही परलोक में भी सुख पाता है।

संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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