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इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः
देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकायणि साधयेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञानी मनुष्य को बगुले की तरह एकाग्रता के साथ अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए अपनी शक्ति के अनुसार ही अपना काम करना चाहिये।
प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति।
सर्वारम्भेण तत्कार्य सिंहादकं प्रचक्षते।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य को चाहिये कि वह सिंह की तरह किसी कार्य को छोटा या बड़ा न मानकर अपनी पूरी शक्ति से अपना दायित्व संपन्न करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वैसे तो किसी भी चालाक या धूर्त व्यक्ति को बगुला भगत कहकर उसका अपमान किया जाता है। बगुले को धूर्तता का प्रतीक भी माना जा सकता है, पर लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उसकी एकाग्रता और धीरज का गुण मनुष्य को अपनाना चाहिये। समय बलवान है इसलिये हर मनुष्य को अपने संक्रमण काल में भी पथभ्रष्ट न होते हुए अपना धैर्य बनाये रखना चाहिये। लक्ष्य पवित्र हो और उस पर से अपनी दृष्टि तब तक न हटायें जब तक वह प्राप्त न हो जाये। आजकल संक्षिप्त मार्ग अपनाने की जो प्रवृत्ति निर्मित होती है वह आत्मघाती है और उससे कोई बड़ी सफलता नहीं मिल पाती।
उसी तरह किसी काम को छोटा या निम्न कोटि का नहीं समझना चाहिये। इतना ही नहीं किसी भी प्रकार के श्रम करने वाले व्यक्ति को भी छोटा नहीं मानना चाहिये। सिंह तो सिंह है पर वह हर काम स्वयं ही करता है। किसी का झूठा नहीं खाता-उसके बारे में कहा जाता है कि वह अपना शिकार कर ही भोजन खाता है। उसी तरह हर मनुष्य को चाहिये कि वह अपना काम स्वयं करे। सच बात तो यह है कि स्वयं काम करने से जीवन में आत्मविश्वास बढ़ता है। जो व्यक्ति श्रम से बचते हैं वह धीरे धीरे भय तथा कुंठा का शिकार हो जाते हैं।
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संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
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