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नास्तिक्यं वेदनिंदा च देवतानां च कुत्सनम्।
द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
भगवान के अस्तित्व पर अविश्वास, वेदों की निंदा, देवताओं का अपमान, अन्य लोगों से शत्रुता तथा विरोध रखना, पाखंड, अहंकार, क्रोध तथा स्वभाव में उग्रता होना ऐसे दोष हैं जिनका त्याग करना ही श्रेयस्कर है।
न पाणिपादचपलो नेत्रचपलोऽनृजुः।
न स्वाद्वाक्वंपलश्चैव न परद्रोहकर्मधीः।।
हिन्दी में भावार्थ-
अपने शरीर और आंखों को अकारण नहीं मटकाना चाहिये। स्वभाव से कुटिल तथा दूसरों की निंदा करने वाला भी नहीं बनना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में कुछ लोगों को केवल इसलिये ही प्रसिद्धि मिली है क्योंकि वह वेदों की निंदा करते हैं। इससे भी अधिक यह बात कि करते हो वह सभी धाार्मिक विचाराधाराओं के सम्मान की बात पर भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों-खासतौर से वेद-की आलोचना करने के अलावा उनको कोई काम नहीं है। विदेशों में पनपी धार्मिक विचाराधाराओं की आलोचना में उनको घबड़ाहट होती है और तब वह सभी धार्मिक विचाराधाराओं के सम्मान का नारा लगाकर बचकर निकल लेते हैं। यह हमारे समाज की कमजोरी है कि यहां निंदा और स्तुति में ही लोग अपना समय खराब करते हैं। एक तो वह है जो स्वयं करते हैं दूसरे वह लोग हैं जो स्वयं ही इन कार्यों में लिप्त हो जाते हैं।
मुख्य बात यह है कि आप किसी भी धार्मिक विचारा धारा को माने या सभी को अस्वीकार कर दें पर आपको किसी के ग्रंथ पर टीका टिप्पणियां नहीं  करना चाहिए। उसी तरह किसी के इष्ट का मजाक उड़ाना भी भारी पाप है। आप भगवान के किसी स्वरूप का न माने पर अपने आपको नास्तिक बताकर अपनी श्रेष्ठता न बघारें-यह पाखंड, अहंकार और मक्कारी की श्रेणी में आता है। संभव है कि किसी के सामने उसके इष्ट की आप निंदा करें तो उसे क्रोध में आकर अपमानित करे। तब आप भी क्रोध में आयेंगे।
सच बात तो यह है कि नास्तिकता तथा आस्तिकता का विचार अपने मन में रखने लायक है। दोनों ही स्थितियों में जब आप उसे बाहर व्यक्त करते हैं तो इसका आशय यह है कि आप अहंकार तथा पाखंड का शिकार हो रहे हैं। ऐसी बुराई को त्याग करना ही श्रेयस्कर है ताकि समाज में वैमनस्य न फैले। कहा भी जाता है कि धर्म एकदम निजी विषय है इसलिये उसके बारे में जो विचार है उनकी अभिव्यक्ति करना ढोंग करने जैसा ही है।

संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
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