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‘नानक गुरु न चेतनी, मनि आपणै सुचेत।
छूटे तिल बूआड़ जिउ, सुंबे अंदरि खेत।
खेतै अंदरि, छुटिआ, कहु नानक सउ नाह।
फलीअहि फुलीअहि बपुड़े, भी तन विचि सुआह।।
हिन्दी में भावार्थ-
भगवान गुरुनानक देव कहते हैं कि जो मनुष्य गुरु के संदेश को जीवन में धारण नहीं करते तथा अहंकार वश अपने आपको चतुर समझते हैं उनकी स्थिति खेत में जले हुए तिल के पौधे के समान होती है जो वहीं पड़ा रहता है। ऐसे पौधे फलते फूलते भी हैं पर इनकी फलियों में तिलों की जगह राख होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-देश में इस समय ढेर सारे गुरु हैं। यह गुरु भी अपने गुरुओं की छत्र छाया में आश्रम बना कर रह रहे हैं और परम ज्ञानी होने का दिखावा करते हुए भक्तों की भीड़ जुटाते हैं। यह व्यवसायिक गुरु धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथायें सुनाकर भक्तों का मनोरंजन करते हैं पर उनको ज्ञान नहीं दे पाते। इसका कारण यह भी है कि उन्होंने अपने ही गुरुओं से ज्ञान कहां ग्रहण किया होता है जो दूसरे को धारण कर उसका जीवन सुधार सकें। यही कारण हमारे देश में इतने सारे धार्मिक तथा अध्यात्मिक कार्यक्रम होते ही नैतिक तथा सामाजिक चरित्र गिरावट की तरफ अग्रसर है।
गुरुपूर्णिमा के अवसर पर यह सभी गुरु अपने आसपास जमघट लगाते हैं। उनके यहां एकत्रित भीड़ देखकर ऐसा आभास होता है जैसे कि सतयुग आ रहा हो पर लोग अपने घर लौटे और वही ढाक के तीन पात। सभी अपने प्रपंच में लग जाते हैं। इस तरह के धार्मिक कार्यक्रम तो केवल पिकनिक की तरह मनाये जाते हैं। यह आधुनिक व्यवसायिक गुरु अपने गुरुओं से ज्ञान की बजाय प्रवचन की कला सीख कर अपने आपको चतुर समझते हैं। उनमें धन संचय का मोह होता है और इस कारण उनमें सांसरिक दुर्गुण पूरी मात्रा में होते हैं। अपने अहंकार वश वह किसी अन्य को ज्ञानी नहीं मानते। यही स्थिति उनके चेलों की है। यही कारण है कि सभी जगह राख ही राख दिखाई देती है।
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संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
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