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मनुष्य की बुद्धि कहीं न कहीं किसी प्रकार से विषयों से जुड़ती है जिसे हम योग भी कह सकते हैं। जब मनुष्य की बुद्धि स्वतः यह काम करती है तब वह अंधेरी गली में भटकता है। जहां मन में आया वही चले गये या फिर सोचने लगे। यह असहज योग की स्थिति है। मगर जब मनुष्य योग साधना और ध्यान से अपनी बुद्धि पर नियंत्रण कर लेता है तब यही बुद्धि रचनात्मक कार्यों में लग जाती है जिसके परिणाम सुखद होते हैं। यह सहज योग की स्थिति है। ऐसे में जो मनुष्य असहज योग के साथ जीते हैं उनमें जाति पाति तथा धन संपदा का अहंकार स्वतः आ जाता है जिससे वह आक्रामक होकर नकारात्मक राह पर चल पड़ता है। योगेश्वर श्री कृष्ण कहते हैं कि जो मुझे भजेगा वही मुझे मिलेगा पर उनको मानने वाले अनेक कथित मठाधीश हैं जो अपने यहां के आश्रमों में प्रवेश के लिये जातीय शर्ते लगा देते हैं। यह ढोंग सदियों से चल रहा है पर सच बात तो यह है कि ऐसे धर्मांध व्यक्ति न केवल स्वयं बल्कि समाज को भी अंधेरे में धकेलते हैं। पतंजलि योग दर्शन में इसी तरफ संकेत कर कहा गया है कि जाति पाति के भाव से रहित व्यक्ति महावत की तरह होता है।
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जातिदेशकालसमयानमच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्।
हिन्दी में भावार्थ
-जाति, देश, काल तथा व्यक्तिगत सीमा से रहित होकर सावैभौमिक विचार का हो जाने पर मनुष्य एक महावत की तरह हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-महर्षि पतंजलि यहां पर मनुष्य को संकीर्ण विचाराधाराओं से बाहर आने का संदेश दे रहे हैं। योगासन और प्राणायाम के बाद मनुष्य की देह तथा मन में स्फूर्ति आती है तब उसके हृदय में कुछ नया कर गुजरने की चाहत पैदा होती है। ऐसे में वह अपने लक्ष्य निर्धारित करता है। उस समय उसे अपने मस्तिष्क की सारी खिड़कियां खुली रखना चाहिए।
हमारे देश में जाति, भाषा, वर्ण तथा क्षेत्र को लेकर संकीर्णता का भाव लोगों में बहुत देखा जाता है। सभी लोग अपने समाज की श्रेष्ठता का बखान करते हुए नहीं थकते। हमारे देश में समाज का विभाजन कर कल्याण की योजनायें बनायी जाती हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से काम करने में जातीय, भाषाई, तथा क्षेत्रीय भावनाओं की प्रधानता देखती है जाती है। इस संकीर्ण सोच ने हमारे देश के लोगों को कायर और अक्षम बना दिया है। भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है क्योंकि हर आदमी अपने व्यक्तिगत दायरों में होकर सोचता है और उसे समाज से कोई सरोकार नहीं  है।
जिन लोगों को कुशल महावत की तरह अपने जिंदगी रूपी हाथी पर नियंत्रण करना है उनको अपने अंदर किसी प्रकार की संकीर्ण सोच को स्थान नहीं देना चाहिये। जब आदमी जातीय, भाषाई, वर्णिक तथा क्षेत्रीय सीमाओं के सोचता है तो उसकी चिंता अपने समाज पर ही क्रेद्रित होकर रह जाती है। तब उसे लगता है कि वह कोई ऐसा काम न करे करे जिससे उसका समाज नाराज न हो जाये। यहां तक कि इस डर से वह दूसरे समाज के लिये हित का न तो सोचता है न करता है कि वह उसके समाज का विरोधी है। इससे उसके अंदर असहजता का भाव उत्पन्न होता है। जब आदमी उन्मुक्त होकर जीवन में में विचरण करता है तब वह विभिन्न जातीय, भाषाई, तथा क्षेत्रीय समूहों में भी उसको प्रेम मिलता है जिससे उसका आनंद बढ़ जाता है।

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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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