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उदम करहि अनेक हरि नाम न गावही।
भरमहि जोनि असंख मन जन्महि आवहीं।।
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुवाणी के अनुसार जो मनुष्य अनेक प्रकार के उद्यमों से सांसरिक उपलब्लियां तो प्राप्त करता है पर परमात्मा का नाम नहीं लेने से वह असंख्य योनियों में भटकता है।
सो कीउ मनहु विसारीअै जाके जीअ पराण
तिसु विणु सभु अपवितु है जेना पहिनणु खाणु।।’
हिन्दी में भावार्थ-
जिस ईश्वर ने हमें जीवन और प्राण उपहार में प्रदान किए हैं उसे भूलना अनुचित है। उसका स्मरण के बिना खाना और पहनना अपवित्र है।
अनिक रूप खिन माहि कुदरति धारदा।
हिन्दी में भावार्थ-
यह प्रकृति अत्यंत शक्तिशाली है जो पल भर में अनेक रूप धारण करती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-एक सवाल अक्सर लोग पूछते हैं कि आखिर ईश्वर का नाम लेने से क्या लाभ है? जब संसार में हम स्वयं ही सारे काम कर रहे हैं और उसके फल भुगतने के लिये तैयार भी हैं तब किसका भय है?
दरअसल इसके लिये हमें अपने अंदर स्थित मन तथा बुद्धि तत्व को समझना जरूरी है। दुनियां की सारी दौलत के साथ शौहरत पाने वाला आदमी भी अपने को सुखी अनुभव नहीं करता तो गरीब का तो सवाल ही नहीं है तो यह प्रश्न उठता है कि सुख चीज क्या है? मनुष्य अपने कर्म से सांसरिक कार्यों में लिप्त रहता है पर उसकी आत्मा-जो वह स्वयं ही है- न खाने का सुख जानती है न पीने का वह अपने लिये शांति तलाशती है और न मिल पाने पर उसकी छटपटाहट ही मनुष्य के तनाव कारण बनती है। इसके अलावा मन तो महान खिलाड़ी है। महल में रहती देह को समझाता है कि झौंपड़ी वाला सुखी है और झौंपड़ी में रहने वाले को बताता है कि महल में तो सारे सुख हैं। मन का गुलाम मनुष्य इधर उधर दौड़ता है पर नहीं मिलता तो सुख! इसका कारण यह है कि आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में आदमी अपनी देह को देखता है अपने को नहीं। पाने का सुख तभी है जब त्याग करना जानते हों तो सोने का सुख बिस्तर से नहीं नींद आने से हैं। मन परिवर्तन चाहता है और ऐसे में सांसरिक वस्तुओं को इष्ट मानने वाला व्यक्ति परमात्मा का स्मरण करे तो उसे सुखद परिवर्तन की अनुभूति होती है। यही कारण है कि आज भी अनेक लोग मंदिरों में जाकर अपने मन को तसल्ली देते हैं।
हम यहां मूर्तिपूजा की भी चर्चा कर लें। दरअसल बनी तो वह किसी धातु या पत्थर की होती हैं पर जब हम उनको पूजते हैं तो हमारे अंदर ही ऐसी पवित्र भावनायें उठती हैं जो उसके भगवान होने की अनुभूति कराती हैं। हमें मूर्तियों की पूजा से भौतिक लाभ की अपेक्षा मानसिक लाभ का आंकलन करना चाहिये जो एकदम अनमोल होता है। एकदम निरंकार को पूजना सामान्य आदमी के लिये थोड़ा कठिन है इसलिये ही शायद मूर्तिपूजा के द्वारा उसमें भगवान का भौतिक स्वरूप स्थापित करने का प्रयास किया गया है जो कि अंततः निरंकार की तरफ ले जाता है।
कहने का अर्थ यह है कि सांसरिक विषयों में लिप्त रहने से ही शांति नही मिलती और परिवर्तन के लिये ही सही परमात्मा का नाम लेकर हम लाभ उठा सकते हैं।
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संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
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