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बहूनां चैव सात्तवानां समवायो रिपुञ्जयः।
वर्षधाराधरो मेघस्तृपौरपि निवार्यते।
हिन्दी में भावार्थ-
अगर लोगों का समूह बड़ा होने के साथ ही एकता कायम किये रहे तो वह शत्रु पर विजय प्राप्त कर लेता है जैसे वर्षा की तेज धारा होने होने के बावजूद तिनकों का समूह उसे आगे बहने से रोक लेता है।
हिन्दी में भावार्थ-सामान्य मनुष्य की सोच हमेशा ही अपनी चिंताओं के इर्दगिर्द घूमती है। सच बात तो यह है कि इस संसार के संकट दुष्टों द्वारा इसलिये ही पैदा किया जाता है क्योंकि सज्जन लोग एक होकर उनका मुकाबला नहीं कर पाते। मुकाबला करना तो दूर ऐसा सोचते भी नहीं है।
कहा भी जाता है कि विश्व की समस्यायें दुष्टों की सक्रियता से नहीं बल्कि सज्जनों की निष्क्रियता के कारण बढ़ती हैं । सज्जन लोग अपने तथा परिवार के जीवन की रक्षा के लिये इतने आतंकित रहते हैं कि एक दूसरे की मदद करने की बजाय परस्पर ही पीड़ित के दोष ढूंढने लगते हैं। सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के साथ बदतमीजी और बेबसों पर हमले इसी कारण ही होते हैं क्योंकि अपराधियों को पता है कि डरपोक कथित भले लोग कभी भी पीड़ित की मदद को नहीं आयेंगे।
हमारे देश की महिमा तो बड़ी विचित्र है। सभी जानते हैं कि यह जीवन क्षण भंगुर है और जब मृत्यु आयेगी तब कोई भी उसे रोक नहीं पायेगा पर अपने मतलब से ही मतलब रखने वाले इसे भूलकर डरपोक जैसा जीवन गुजारते हैं। यही कारण है कि फूट का लाभ दुष्ट लोग उठाते हैं।
अगर सज्जन लोग अपने अंदर चेतना, दृढ़ता और परस्पर सहयोग का भाव लायें तो दुष्टों को रोक जा सकता है। इस बात पर अगर गंभीरता विचार किया जाये तो तिनके भी हमें सिखा सकते है जो ढेर सारी बरसात में भी उसके सामने विचलित नहीं होते। जहां झुंड की तरह खड़े हैं वहां उसका पानी रोके रहते हैं। इन्हीं तिनकों से बनी झौंपड़ियां अपने स्वामी की बरसात से रक्षा करती हैं।

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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