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दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम्।
शास्त्रं वंदेद् वाक्यं मनः पूतं समाचरेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि दृष्टि से देखकर प्रथ्वी पर पांव रखें, कपड़े से छानकर पानी को पिऐं, शास्त्र से शुरु कर वाक्य बोलें और मन से सोचकर कार्य प्रारंभ करने पर उसे पूरा अवश्य करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिंदगी में सावधानी के साथ ही चिंतन और मनन की आवश्यकता होती। अधिकतर लोग दूसरों की शान शौकत या दौलत देखकर वैसा ही बनने का सपना पाल लेते हैं। वह यह नहीं देखते कि किसने किस तरह अपनी जिंदगी में संघर्ष किया है। अनेक लोग हवाई किले बनाकर चल पड़ते हैं पर कामयाबी न मिलने पर संकट में पड़ जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जीवन में हर कदम पर सोच समझकर ही अपना काम प्रारंभ करना चाहिए।
अनेक जगह लोग निरर्थक वार्तालाप करते हैं। अनेक बार तो बातचीत में झगड़े हो जाते हैं और नौबत खून खराब की आ जाती है। लोग अध्यात्म ग्रंथों की बजाय कल्पित साहित्य और फिल्मों से प्रभावित इतने हैं कि उनको यह पता नहीं है कि जिंदगी कितनी कठिन है और उसमें सपने देखना और उनको पूरा करना अलग अलग बातें हैं। खासतौर से नयी पीढ़ी को तो एकदम सुविधाभोगी जीवन के सपने प्रचार माध्यम दिखा रहे हैं। बंगला, कार, तथा घर में नौकर होने का ख्वाब सभी को है पर यह पता नहीं कि नौकर भी एक इंसान होता है जिसे बंगला और कार की तरह बेज़ान नहीं माना जा सकता। न ही हर नौकर फिल्म या धारावाहिक की तरह वफादार होता है। यही कारण है कि घरेलु नौकरों द्वारा किये जा रहे अपराधों की संख्या बढ़ रही है।
कहने का अभिप्राय यह है कि आंखें खुली होने के साथ ही बुद्धि भी सक्रिय रखना चाहिये। फिल्में देखना या कल्पित साहित्य पढ़ना बुरा नहीं है पर जीवन के यथार्थ का ज्ञान भी अपने आसपास की घटनाओं तथा पुराने लोगों से प्राप्त करना चाहिए।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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