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प्रत्ययस्य परचितज्ञानम्
हिन्दी में भावार्थ-
चित्त की वृत्ति का ज्ञान होने पर दूसरे के चित्त को भी जाना जा सकता है।
न च तत्सालब्बनं त्साविषयीभूतत्वात्।
हिन्दी में भावार्थ-
किन्तु वह ज्ञान आलम्बनसहित नहीं होता क्योंकि वह योगी के चित्त का विषय नहीं है। मतलब यह कि दूसरा किसी वस्तु पर चिंतन कर रहा है इसका आभास नहीं होता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-योगी अपने योगासन, ध्यान, प्राणायाम तथा मंत्रजाप का अभ्यास करते हुए अपने चित्त का साक्षात्कार करने लगते हैं। इस साक्षात्कार से उनके दूसरों के चित्त की भी सारी वृत्तियों का स्वरूप उनकी समझ में आ जाता है। इसी आधार पर वह अपने व्यवहार और संपर्क में पास आने वाले लोगों के चित्त की भावनाओं का आभास करने लगते हैं पर वह उसके अंदर चल रही भौतिक विषय का आभास नहीं करते। कोई व्यक्ति अपने साथ व्यवहार में बेईमान करने वाला है यह तो समझ में आ जाता है पर इससे वह कौनसा भौतिक लक्ष्य वह प्राप्त करना चाहता है इसका आभास नहीं होता। किसी ने ठगी कि या भ्रष्टाचार किया इसका पता चल जाता है पर उसने अपने लिये कौनसा सामान जुटाया यह पता नहीं लगता। मतलब यह कि दूसरे के चित्त की अभौतिक वृत्ति जानने तक ही उस ज्ञान की एक सीमा है।
प्रसंगवश हम यहां धूर्त तांत्रिकों की भी बात कर लें जो कहीं बच्चा खो जाने या धन चोरी हो जाने पर उसका पता बताते हैं। यह उनके लिये संभव नहीं है। जब बड़े बड़े योग में पूर्णता प्राप्त करने वाले योगी भी इतना भौतिक आभास नहीं पा सकते तो वह ढोंगी तांत्रिक यह काम कैसे कर सकते हैं। हां, इतना अवश्य है कि योगी अन्य मनुष्य की वाणी, चाल चलन तथा विचारों से उसके व्यक्तित्व और भावना का मूल्यांकन आसानी से कर लेते हैं और उसके अनुसार ही उससे व्यवहार और संपर्क की सीमा तय करते हैं।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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