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वैचारिक योग की भी एक स्थिति है।  जब हमें लगे कि क्रोध का हमला हम पर हो गया है तब शांति की कल्पना करें, जब किसी वस्तु के प्रति लालच का भाव आ गया है तब त्याग का विचार करें।  इससे हमें अपने अंतर्मन में चल विचार की प्रतिपक्ष में स्थिति क्या है, यह समझ मे आयेगा।  हम सामने खड़े होकर अपने व्यक्त्तिव को निहारें तब पता लगेगा कि हम दूसरों को कैसे दिख रहे हैं। 

आधुनिक सभ्यता के विशेषज्ञ अक्सर सकारात्मक भाव को जीवन की सफलता का मूल मंत्र बताते हैं। अनेक अनुभवी लोग भी सभी को सकारात्मक विचाराधारा रखने की सलाह देते हैं पर यह भाव आये कैसे इसे कोई नहीं बता सकता क्योंकि इसके लिये मनुष्य मन के रहस्य को समझना जरूरी है जिसे कोई विरले ही समझ पाते हैं। पतंजलि योग सूत्र को विज्ञान इसलिये भी कहा जाता है क्योंकि वह मनुष्य की देह, मन तथा विचारों में शुद्धता लाने का मार्ग भी बताता है।

इस विषय में पतंजलि योगा साहित्य में कहा गया है कि 
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वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा।
दुःखज्ञानान्तफला इतिप्रतिक्षभावनम्।।
“हिंसा आदि का भाव वितर्क कहलाते हैं जिन पर आधारित बुरे कर्म स्वयं या दूसरों से करवाये जाते हैं या उनका अनुमोदन किया जाता है। यह वितर्क वाला भाव लोभ, क्रोध और मोह के कारण पैदा होता है। यह भाव दुःख और अज्ञान के रूप में फल प्रदान करते हैं अतः उनके लिये प्रतिपक्षी विचार करना चाहिए।”
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनाम्।
“जब वितर्क और यम नियम में बाधा पहुंचाये तब उनके प्रतिपक्षी विचारों का ध्यान करना चाहिए।”

मनुष्य का मन चंचल और बुद्धि में कुटिलता का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है। इसलिये ही अज्ञानी मनुष्य व्यसनों की तरफ आकर्षित होता है जो कि उसके लिये देह के लिये हानिकारक हैं और वह जरा जरा बात पर क्रोध का शिकार होता है जो कि उसके लिये मानसिक तनाव का कारण बनता है। इन पर नियंत्रण करने के लिये राय देना आसान है पर इसका मार्ग जाने बिना कोई भी आत्मनियंत्रण नहीं कर सकता। इसके लिये अभ्यास की आवश्यकता है। इस अभ्यास का तरीका यह है कि जब हमारे अंदर आवेश, निराशा या अस्थिरिता का भाव आता है तब हमें अपने समक्ष उपस्थित प्रसंग पर विपरीत दृष्टिकोण पर भी विचार करना चाहिए। जब किसी की बात पर गुस्सा आता है तब हमें यह भी देखना चाहिए कि कहीं सामने वाले की बात सही तो नहीं है, अगर वह गलत है तो यह भी जानने का प्रयास करना चाहिए कि वह किसी अन्य की प्रेरणा से तो यह नहीं कह रहा। इसके बाद उस बात को अनसुना करने का प्रयास भी करना अच्छा रहता है। उसी समय यह भी विचार करना चाहिये कि आखिर क्रोध करने के परिणाम क्या होंगे। उसके बाद इस बात पर भी चिंतन करना चाहिये कि इस जीवन में प्रसन्नता लाने के लिये अन्य विषय भी हैं जिससे ध्यान अच्छी बात की तरफ चला जाये। कोई गाली दे तब अपने अंदर ओम शब्द का ध्यान करें और जब कोई लड़ने आये तो विनम्रता और मौन का मार्ग अपनायें जिससे तत्काल न केवल तनाव समाप्त होता है बल्कि एक प्रकार से अलौकिक प्रसन्नता भी प्राप्त होती है।

हमारे जीवन में अनेक लोग संपर्क में आते हैं। कई लोग दुःख देते हैं तो कोई प्रसन्नता देते हैं। जो दुःख का हेतु हैं उनका स्मरण होने पर अपना ध्यान प्रसन्न करने वाले लोगों की तरफ लाना चाहिये। इसके कष्ट आने पर आनंद के गुजरे पलों का स्मरण कर अपने अंदर यह दृढ़ भाव स्थापित हो जाता है कि समय की बलिहारी है वह अच्छा समय नहीं रहा तो यह बुरा भी नहीं रहेगा। इसी तरह अभ्यास करने से ही सकारात्मक भाव पैदा किया जा सकता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com