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मनुष्य को विनम्रता का भाव हमेशा अपना चाहिए पर इसका मतलब यह नहीं है कि अक्षम, नकारा, भ्रष्ट तथा अहंकारी लोगों की संगत में जाने की सामाजिक शर्त का पालन भी करें। अंततः संगत का प्रभाव पड़ता है। जैसे लोगों के बीच बैठेंगे उनकी वाणी तथा सक्रियता के प्रभाव से बचना संभव नहीं है चाहे कितना कोई आम इंसान ज्ञानी क्यों न हो।
पैसा, पद तथा प्रतिष्ठा अर्जित करने वाले अनेक लोग मदांध हो जाते हैं और अपने साथ अभिवादन करने की प्रक्रिया को वह अपनी चाटुकारिता समझकर इठलाते हैं। वह अभिवादन का उत्तर देते नहीं है और देते हैं तो उनका अहंकार भाव प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है। ऐसे लोग सम्मान के योग्य नहीं होते। उनकी तरफ से मुंह फेरना ही एक श्रेष्ठ उपाय है।
इस विषय में मनुमहाराज मनुस्मृति में कहते हैं-
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यो न वेत्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम्।
नाभिवाद्य स विदुषा यथा शूर्दस्तथैव सः।।
“जो अभिवादन का उत्तर देना नहीं जानता उसे प्रणाम नहीं करना क्योंकि वह इस सम्मान के अयोग्य होता है।”
अवाच्यो तु या स्त्री स्वादसम्बद्धा य योनितः।
भोभवत्पूर्वकं त्वनेमभिभाषेत धर्मवित्।।
“धर्म का ज्ञान रखने वाले को चाहिए कि वह दूसरे ज्ञानी को कभी भी नाम से संबोधित न करे भले ही वह उससे छोटी आयु का क्यों न हो। उसको हमेशा सम्मान से संबोधित करना चाहिए।”

उसी तरह अगर कोई ज्ञानी है और आयु में छोटा हो भी उसका सम्मान किया जाना चाहिये। इसका उदाहरण आज के कंप्यूटर युग में लिया जा सकता है। जब कंप्यूटर का उपयोग आम लोगों ने शुरु किया तो उसे सीखने के लिये अपने से छोटी आयु के लड़कों से सीखना प्रारंभ करना पड़ा। वह एक छात्र के रूप में अपने शिक्षक को सम्मानीय संबोधन देने लगे। यह हमारी महान सांस्कृतिक परंपराओं का ही प्रमाण है। फिर कंप्यूटर की शिक्षा ऐसी है कि संभव है कुछ बच्चे पहले शिक्षा या अधिक अभ्यास से अपने से बड़े बच्चों से पहले दक्ष हो जाते हैं। इतना ही नहीं वह शिक्षक भी बन अपने दायित्व निभाते हैं। ऐसे में उनको सर या श्रीमान् का संबोधन देने से अपने अंदर कभी कुंठा अनुभव नहीं करना चाहिए।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com