समसामयिक विषयों पर लिखना इसलिये भी व्यर्थ लगता है क्योंकि उसको कुछ समय बाद पढ़ने पर ही बासीपन का अहसास होता है। किस्सा अन्ना हजारे साहेब की गिरफ्तारी और रिहाई का है। सुबह उनकी गिरफ्तारी की खबर पर उस पर लिखने की बात समझ में नहीं आयी क्योंकि हमें पता था कि समसामयिक घटनाओं में दिन भर में बहुत सारा बदलाव आता है। शाम को जब लौटे तो उनके रिहा होने की खबर मिली। इसका मतलब गिरफ्तारी पर लिखते तो वह शाम तक बासी हो जाता।उससे पहले भी उन्होंने एक आंदोलन किया था जिस पर हमने लिखा। वह सामयिक था पर अभी भी पढ़ा जा रहा था। इंटरनेट पर जहां यह सुविधा कि किसी विषय पर आपके हाथ से लिखा कभी पढ़ा जा सकता है तो यह समस्या भी है कि वह तब भी पढ़ा जायेगा जब उसे पढ़ने की अवधि निकल चुकी हो।
           इधर अन्ना साहेब का भारतीय प्रचार माध्यमों पर फिर जोरदार ढंग से अवतरण हुआ। उनके आंदोलन की बात सामने आयी। तब समझ में नहीं आ रहा था कि उसके परिणामों पर क्या अनुमान जतायें। इस पर एक लेख तीन चार दिन पहले तब लिखा था जब उनके प्रचार ने अभी गति नहीं पकड़ी थी। जैसे ही प्रचार ने जोर पकड़ा तो एकदम उस पर पाठक आ गये। अन्य कई लेख भी आये पर उनकी अवधि बीत चुकी थी। इस आंदोलन को लेकर हमारा नजरिया दूसरा है। अगर अन्ना हज़ारे साहब के आंदोलन से देश में कुछ बदलाव आये तो हम खुश होंगे पर अभी निकट भविष्य में ऐसी कोई संभावना नहीं है। उनकी मांगों पर विवाद है और इस देश की समस्या यही है कि यहां आदमी समाज हित की बात इसी शर्त पर सोचता है कि उसे नाम या नामा मिले तभी करेगा। खास आदमी अधिक चाहता है तो आम आदमी भी कम से कम चाहता है। सीधी बात कहें तो समाज की सोच में ही दोष है इसलिये जब तक उसमें बदलाव नहीं आयेगा सारी बातें हवा होती दिखेंगी। बहरहाल अन्ना साहेब के प्रयासों से उनको उनको देश में अच्छी खासी लोकप्रियता मिली। 15 अगस्त से पूर्व गांधी समाधि पर जाकर उन्होंने जाकर जो ढाई घंटे तक ध्यान लगाया वह दर्शनीय था। देखा जाये तो उनको भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन सांसरिक विषय है पर ध्यान एकदम अध्यात्मिक क्रिया है। अन्ना की देश में लोकप्रियता है और अगर इस बहाने ध्यान पद्धति का प्रचार हो जाये तो बहुत अच्छा रहेगा। सांसरिक विषय कभी समाप्त नहीं होते पर ध्यान सिद्धि हो तो वह आदमी को अनेक पीड़ाओं से मुक्ति दिलाती है।
            इस प्रसंग में बाबा रामदेव की बात की जाये। अभी तक उनकी लोकप्रियता उनके योग प्रशिक्षण की वजह से थी और राजनीतिक दल बनाने या भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उसमें एक प्रतिशत भी वृद्धि नहीं हुई। हम जैसे लोग उनकी अध्यात्मिक छवि की प्रशंसा करते हैं। योग साधना से व्यक्ति निर्माण होता है यह अलग बात है कि उसका अहसास नहीं होता। व्यक्ति निर्माण से समाज में स्वतः स्फृर्ति का संचार होता है। वैसे बाबा रामदेव के आलोचक उनको व्यायाम शिक्षक की उपाधि तक ही सीमित मानते हैं। दरअसल बाबा रामदेव अपने प्रशिक्षण में ध्यान की उस शक्ति की बात नहीं करते जो वाकई मनुष्य को तेजस्वी बनाती है। हमें यह पता नहीं था कि अन्ना हजारे साहिब भी ध्यान की कला में दक्ष हैं। देखा तो अच्छा लगा।
              उनके ध्यान की मुद्रा वाकई बहुत दर्शनीय थी। हमारी अनुभूति के अनुसार ध्यान के बाद संविधान क्लब पर उनका जो भाषण हुआ वह अन्य भाषणों से अलग था। उन्होंने इस भाषण में जनलोकपाल की ही नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की बात भी कही जो शायद हमने अभी तक उनके मुख से नहीं सुनी थी। तब हम सोच रहे थे कि उनके अंदर इस नवीन विचार का संचार क्या यह उनके ध्यान का परिणाम था?
          मान लीजिये वह अपने पूर्ववर्ती आंदोलनों से विख्यात नहीं भी होते और ध्यान की कला का प्रशिक्षण देते होते तो शायद वह बाबा रामदेव की तरह ही लोकप्रिय होते। बहरहाल इन दोनों  महानुभावों के प्रति हमारे मन में आकर्षण उनके सांसरिक विषयों से अधिक योग साधना और ध्यान की वजह से अधिक है। हमारा मानना है कि अध्यात्मिक विषयों में पारंगत विषय सांसरिक विषयों से परे तो नहीं भागता पर उन पर इस तरह नियंत्रण रखता है कि उनमें ऊंच नीच की चिंता उनको नहंी होती। बहरहाल जब हम सांसरिक विषयों पर लिखते हैं तो इस बात को नहीं भूलते कि उसका अध्यात्मिक पक्ष भी लिखना चाहिए। हमारा देश लोकतांत्रिक है इसलिये यहां आंदोलन तो चलते ही रहेंगे। विवाद भी होंगे पर उनसे जुड़े पात्रों का अध्यात्मिक पक्ष देखन रुचिकर लगता है। सच बात तो यह है कि जब हमने उनको ध्यान लगाते देखा तो फिर उनके सांसरिक विषयों से ध्यान हटकर उनकी अध्यात्मिक शक्ति की तरफ आकृष्ट हो गया। यही कारण है कि इस लेख में उनके सांसरिक विषय से अधिक ध्यान की मुद्रा पर लिखने की प्रेरणा मिली।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।